हजरत मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी जिनको लोग ख्वाजा गरीब नवाज के नाम से जाना जाता है

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती इस्लाम धर्म के एक महान सूफी संत रह चुके है

ख्वाजा गरीब नवाज को गरीबो का मसीहा भी कहा जाता है क्योकि वह दुसरो को खाना खिलाते थे और खुद भूखे रहते थे

वह अल्लाह के सच्चे बन्दे थे | हजरत मोईनुद्दीन चिश्ती को मानने वालों के एक विशाल जनसंख्या जिनमे सभी धर्म के लोग मानते है |

ख्वाजा गरीब नवाज की जीवनी

ख्वाजा गरीब नवाज के माता पिता

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज के पिता का नाम हजरत ख्वाजा गयासुद्दीन था और उनकी माता का नाम बीबी उम्मुल वरअ था

कुछ विद्वान लोगो का मत है की ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के माता का नाम माह्नुर खासुल मलिका था

जो दाऊद बिन अब्दुल्लाह अल-हम्बली की पुत्री थी |

इस्लाम में ख्वाजा की वालिदा को लेकर अलग अलग मत से यह जाहिर होता है की ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की वालिदा असल में कौन थी यह स्पष्ट नही है?

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का जन्मस्थान-ख्वाजा गरीब नवाज का जन्मस्थान

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के जन्मस्थान को लेकर भी काफी मतभेद है

कुछ विद्वानों और इतिहासकार का मत है की इनका जन्म संजर में हुआ था

तथा कुछ विद्वानों का मत है की उनका जन्म सिस्तान में हुआ था

कई मानते है की संजार जो मोसुल के पास है वहां हुआ था

तो कई लोग मानते है की उनका जन्म संजार जो इस्फिहान के पास है वहां हुआ था

लेकिन इन सभी में देखा जाएँ तो ज्यादा मत इस बात को मिले है की ख्वाजा का जन्म या पैदाइशी की जगह इस्फिहान है

ख्वाजा की परवरिश संजार में हुई थी जिसको कई लोग संजर के नाम से भी जानते है

उस समय में इस्फिहान में एक मोहल्ले के नाम संजर था यही ख्वाजा के माता पिता रहते थे

जब वह सिर्फ 15 साल के थे तभी उनके माता पिता का देहांत हो गया था

जब वह बड़े हुए तो उन्होंने अपनी सारी निजी सम्पति बेच दी और उससे जो धन प्राप्त हुआ उसको गरीबों में बाँट दिया

वह अपना सब कुछ त्याग कर बुखारा गए और वहां से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की|

ख्वाजा गरीब नवाज की यात्रा

ख्वाजा गरीब नवाज बुखारा गए थे वहां उन्होंने अपने गुरु के साथ रह कर धर्म की शिक्षा ली

जहाँ उन्होंने मुस्लिम रीती रिवाज तथा धर्म के बारें में जानकारी हांसिल की

फिर बाद में उन्होंने उस्मान हरुनीके अनुयायी बन गए और मध्य पूर्व में मक्का मदीना तक गए

उसके बाद ख्वाजा गरीब नवाज भारत आ गए उनका बस एक सपना था की वो मुहम्मद से आशीर्वाद प्राप्त करें

काफी लम्बा समय लाहौर में बिताने के बाद ख्वाजा गरीब नवाज मुइज्ज अल-दिन मुहम्मद के साथ अजमेर आये और फिर अजमेर में ही बस गए |

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने एक अलग ही दुनिया का निर्माण किया था |

धर्म को लेकर उनकी व्याख्या कुछ अलग ही थी उनका मानना था की मनुष्य एक शिष्य है, जो अपने आप में नदी जैसी उदारता और सूर्य स्नेह होना चाहिए |

भक्ति में सबसे ज्यादा शक्ति है, जो दुःख में है उनकी सहायता करनी चाहिए और भूखों का पेट भरना चाहिए |

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने अंस अल अरवा और दलील अल अरिफिन यह दोनों पुस्तकें लिखी जिसमे उन्होंने इस्लामिक तौर तरीकों के बारें में बताया है |

ख्वाजा गरीब नवाज का अजमेर में आगमन

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती अजमेर में उनका पहली बार आगमन 1190 को हुआ था |

उस समय में राजा पृथ्वीराज का शासन हुआ करता था |

जब ख्वाजा अपने साथियों के साथ अजमेर पहुचे तो वहां उन्होंने अजमेर शहर से बहार एक पेड़ों के सायें के नीचे अपना ठिकाना बनाया |

लेकिन कुछ क्षण बाद राजा पृथ्वीराज के सैनिक वहा जा पहुचें और उन्होंने कहाँ की आप यहाँ नही ठहर सकते है यह स्थान राजा के ऊटों को विश्राम करने के लिए है |

ख्वाजा को यह बात बुरी लगी तो उन्होंने कहाँ की – अच्छा ऊंट बैठते है तो बैठे |

यह कहकर ख्वाजा वहां से आनासागर के किनारे आकर अपना ठिकाना बनाया |

जब हर रोज की तरह उस दिन भी ऊंट अपनी जगह आकर बैठे तो ऐसे बैठे की फिर खड़े होने के नाम ही नही ले रहे थे

जब काफी प्रयत्न के बाद भी ऊंट वहां से खड़े नही हुए तो उन्होंने यह सारी घटना राजा पृथ्वीराज को बताई |

पहले तो राजा भी यह बात सुनकर हैरतअंगेज रह गए फिर उन्होंने नौकरों को आदेश दिया की जाकें उस फ़क़ीर से माफ़ी मांगों |

नौकर ख्वाजा गरीब के पास गए और माफ़ी मांगी, ख्वाजा ने नौकरों को माफ़ कर दिया और कहाँ की अच्छा जाओ ऊंट खड़े हो गए |

जब नौकर ख़ुशी ख़ुशी ऊटों के पास गए तो वह भी हैरतअंगेज रह गए क्योकि वहां सच में ऊंट खड़े हो गए थे |

और इसके बाद ऐसे ही कई चमत्कार होते रहे और धीरे धीरे अजमेर के आस पास के क्षेत्र में ख्वाजा गरीब नवाज की प्रसिद्धी चारों और आग की तरह फ़ैल गयी |

ख्वाजा गरीब नवाज से प्रभावित होकर साधुराम और अजयराम ने इस्लाम कबुल कर लिया और फिर उन्होंने ख्वाजा से विनती की आप इस शहर से बाहर जंगल को ठिकाने को बदल दे शहर में आबादी वाली जगह में रहे ताकि आपके क़दमों की बरकत से लोग फायदा उठा सके |

ख्वाजा ने दोनों की विनती को स्वीकार करते हुए उनकी बात मान ली और अपने साथी यादगार मुहम्मद को शहर में ठहरने हेतु उपयुक्त स्थान देखने के लिए भेजा |

ख्वाजा ने अपने साथियों को लेकर उस स्थान पर ठिकाना बनाया यहाँ ख्वाजा ने जमाअत खाना, इबादत खाना और मकतब बनवाया |

हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती – ख्वाजा गरीब नवाज की मृत्यु

कहा जाता है की 21 मई 1230 को पीर के दिन (6 रजब 627 हिजरी) को इशा की नमाज के बाद ख्वाजा गरीब नवाज ने अपने हुजरे का दरवाजा बंद कर दिया |

ख्वाजा के हुजरे में किसी को दाखिल होने की अनुमति नही थी हुजरे के बाहर ख्वाजा के सेवक हाजिर थे |

उस दिन पूरी रात उनके कानों में तिलावते कुरान की आवाजें आती रही रात के आखरी हिस्से में वो आवाजें बंद हो गयी |

जब सुबह को फजर की नमाज का वक़्त हुआ और ख्वाजा बाहर नही आयें तो सेवकों को फिक्र होने लगी और सेवकों ने काफी आवाजें लगाईं व दस्तक दी |

काफी देर तक कोई प्रतिक्रिया ना मिलने पर सेवकों ने हुजरे का दरवाजा तोड़ दिया और सेवक अन्दर गए तो उन्होंने देखा की ख्वाजा गरीब नवाज रुखसत हो चुके थे तथा उनके माथें पर कुदरत के यह शब्द लिखे हुए थे – हाजा हबीबुल्लाह मा-त फ़िहुब्बुल्लाह |

ख्वाजा गरीब नवाज की मृत्यु अजमेर शरीफ के लिए एक दुखद घटना थी सारा शहर ग़म में आंसू बहा रहे थे |

ख्वाजा के जनाजे में भी काफी भीड़ इक्कठी हुई थी और ख्वाजा के जनाजे की नमाज ख्वाजा के बेटे ख्वाजा फखरुद्दीन ने पढाई थी |

ख्वाजा को उनके हुजरे में ही दफ़न किया गया था और वहां मजार बनाया गया जिसकी जियारत करने के लिए लोग बडी दूर से इस जगह आते है |

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